रचना को ओ बी ओ की कविता प्रतियोगिता में तृतीय पुरस्कार मिला है:
अनायास ही छीनते, धरती माँ का प्यार,
बालक बिन कैसा लगे, माता का श्रृंगार ?
पंछी का घर छिन गया, छिनी पथिक से छाँव,
चार पेड़ गर कट गए, समझो उजड़ा गाँव.
निज पालक के हाथ ही, सदा कटा यों पेड़,
ज्यों पाने को बोटियाँ, काटी घर की भेड़.
लालच का परिणाम ये, बाढ़ तेज झकझोर.
वन-विनाश-प्रभाव-ज्यों, सिंह बना नर खोर.
झाड़ फूंक होवै कहाँ, कैसे भागे भूत,
बरगद तो अब कट गया, कहाँ रहें "हरि-दूत"?
श्रद्धा का भण्डार था, डोरा बांधे कौम,
भर हाथी का पेट भी, कटा पीपरा मौन.
झूला भूला गाँव का, भूला कजरी गीत,
कंकरीट के शहर में, पेड़ नहीं, ना मीत.
अनायास ही छीनते, धरती माँ का प्यार,
बालक बिन कैसा लगे, माता का श्रृंगार ?
पंछी का घर छिन गया, छिनी पथिक से छाँव,
चार पेड़ गर कट गए, समझो उजड़ा गाँव.
निज पालक के हाथ ही, सदा कटा यों पेड़,
ज्यों पाने को बोटियाँ, काटी घर की भेड़.
लालच का परिणाम ये, बाढ़ तेज झकझोर.
वन-विनाश-प्रभाव-ज्यों, सिंह बना नर खोर.
झाड़ फूंक होवै कहाँ, कैसे भागे भूत,
बरगद तो अब कट गया, कहाँ रहें "हरि-दूत"?
श्रद्धा का भण्डार था, डोरा बांधे कौम,
भर हाथी का पेट भी, कटा पीपरा मौन.
झूला भूला गाँव का, भूला कजरी गीत,
कंकरीट के शहर में, पेड़ नहीं, ना मीत.
--राकेश त्रिपाठी 'बस्तिवी'