Thursday, January 12, 2012

झंझावात विचारो का: Jhanjhavaat Vicharo ka

झंझावात विचारो का, उद्विग्न हो उठा मेरा मन,
जब देखा आज सड़क पर सोते, ठंडी में वो नंगा तन.

बिखरी है समृधि-सरसता, दिखता है बस चैन अमन,
तेरा चेहरा भूल गए हैं टी-वी के ये विज्ञापन.

नई-नई परिभाषाएं हैं, नई दृष्टि है, नए वचन.
बत्तीस रुपये से ऊपर वाले को कहते "कॉमन मैन".

थके हुए हैं, भूखे हैं, हताश भी है जन-गन-मन
सत्ता के मद में खादी को, कौन दिखायेगा दर्पण.

देखें कितने दिन चलते हैं, नारे वादे और दमन.
काठ की हाड़ी रोक सकेगी, कितने दिन तक परिवर्तन

2 comments:

Amaresh Pandey said...

Jhakjhor dene wale bichar hai...

Amaresh,
www.padobado.com

Rakesh Tripathi said...

bahut bahut dhanyavaad, amresh bhai!