Tuesday, January 10, 2012

कबूतर-खाना Kabootar-Khana

बोरीवली की एक और नीरस सुबह थी. जैसे तैसे भगवान् जो कोसते हुए मै ऑफिस के लिए तैयार हुआ. बर्तन माजने वाला एक दिन की छुट्टी ले के चार दिन से लापता था. किसी प्रकार अपने शब्दो को गाली की सीमा में जाने से रोकते हुए घर से बाहर निकला. मेरे घर के बाहर ही कबूतरो का जमवाड़ा लग जाता है. कुछ धार्मिक प्रकृति के लोग सुबह सुबह कबूतरो को चना खिला के दिन भर के किये पापो से मुक्ति पाना चाहते हैं. मै ये विश्वास करता हूँ की रात में कोई पाप न किया हो. वैसे बहुत ही सभ्य समाज है, तो इस बात की संभावना बहुत कम है. वहीँ पास में ही फुटपाथ पर एक चने की बोरी ले कर एक औरत बैठी रहती है. जो लोगो को चने बेच कर कुछ पैसे कमाती है.

पता नहीं कबूतरो की मुझसे क्या दोस्ती है की जैसे हि मै वहां से गुजरता हूँ सब के सब फड फडा के उड़ने लगते हैं, उनके शरीर की सारी गन्दगी उड़ने लगती है और बहुत तेज़ बदबू आती है. मुझे तो लगता है की अगर कभी बोरीवली में बर्ड फ्लू आया तो मुर्गे खाने की वजह से नहीं बल्कि कबूतर पालने की वजह से. बोरीवली स्टेशन जाने को रिक्शा भी वही से मिलता है. तो चाहे न चाहे वहां खड़ा ही होना पड़ता है जब तक कि किसी स-ह्रदय रिक्शा वाले को हम पे तरस न आ जाये. तो इस तरहसे मेरी सुबह के दो -चार पल शांति के प्रतीको के साथ गुजरता है. किन्तु वहां शांति बस प्रतीक के ही रूप में रहती है. इस स्थान और बोरीवली स्टेशन में सिर्फ कबूतर और आदमियो का ही फर्क है.

तो उस सुबह भी मै रिक्शा रूपी ब्रह्म के इंतज़ार में खड़ा था. कबूतरो से बचते बचाते, मेरी निगाह सड़क के दूसरी तरफ गई. वहां तीन चार छोटे बच्चे जमीन पे खेल रहे थे, लोट पोट रहे थे. उनकी माएं वहां नहीं थी. उनके भी हाथो में चने थे और वैसे ही दिख रहे थे जैसे कबूतरो को खाने के लिए दिए गए थे. हो सकता है किसी सज्जन व्यक्ति ने इन्हें भी दाना डाल दिया हो. तभी कबूतरो के झुण्ड के पास एक शोर सुनाई पड़ा. एक आदमी दोनो औरतो से झगड़ रहा था, या यो कह ले की उस जगह से भगा रहा था. मैंने थोडा ध्यान दिया तो पता चला कि वो औरतें जमीन पर गिरे हुए चने बीन रही थी और ये बात उसे असह्य थी कि कबूतरो का खाना कोई और खा ले.

इतने में मुझे भी एक स-ह्रदय रिक्शा वाला मिल गया और स्टेशन की तरफ चल पड़ा.

2 comments:

Geeta said...

.. sorry for enlish reply ... me too face the same story with kabutar everyday ... the problem in india is that ppl think dharmikata is in giving chana to kabutar or giving chara to gai .. which is correct only if u r really feeding it to hungry gai or kabutar... which is not applicable in any of the metro city. kabutar and gai in mumbai are the richest and healthist of all... but ppl ignore so many hungry human being around. they will pour thousands of milk on shankar bhagnvan' on mahashivaratri but will not give a drop to a hungry infant just standing in front of the same mandir. they will waste so much of oil in shani mandir every saturday but will not think of lightening someone else's house with the same oil. .. ppl here blv that doing good is only predefined and shld not be done for really needy... thats sad... really sad.. i wish the comming generation will understand this and will change

Rakesh Tripathi said...

आपने बहुत अच्छा लिखा है गीता जी.
एक शेर सुनाता हूँ.
यहाँ किसी को भी भूखा नहीं मिलता,
दरगाह, या शिवाला जाना पड़ता है.